अब फर्क नही पडता

सतीश देवीदास सांगोळे द्वितीय वर्ष, शंपाणवकीय व दूरसंचार अभियांत्रिकी

के अब फर्क नही पड़ता 

माना केराहे धुंदली सी थी

मंजिल का कोई पता नहीं था

समंदरभी किसी आँधीको गले लगा चुका था पर... 

 

अब जो हम आँधीओसे खेलना सिख गए है

कोई जाके आँधीओसे केहदे

के अब फर्क नही पडता।

 

माना के जिंदगी हमसे रूढी थी

खुशीका कतराभी नजर आ रहा था

शायद हमारीही कोई गलती थी पर...

 

अब जो हम गलती सुधारना सिख गये है

कोई जाके गलती से केह दे

के अब फर्क नहीं पडता।

 

माना के हम जैसोकी कोई किस्मत नहीं होती

दुआ तो खुदा हमारी सुननाही नही चाहता

सर झुकाना जैसे आदतसी बन गयी है पर...

 

अब जो हम किस्मत लिखने खुद निकले है

कोई जाके खुदासे केहदे

के अब फर्क नही पडता