बस धुल चिपक कर रह जाती है, रेत मुट्ठी मे कहीं रह पाती है।

अनजान

     बहुत कोशिश की पानी को पकड़कर रखने की मगर देखिए हँसना जायज है अपनी रस असमर्थता पर न जाने हर पल कितनी कोशिशें करते हम की अपने नियंत्रण को व्यक्त कर पाएँ परंतु संदरता देखिए इस प्रबल प्रकृति की, सदैव हम विफल है। इसे विडंबना ही कह लिजिए परंतु सत्य यही है कि, कुछ नही रह जाएगा इस पल के बाद।।

कितनी सारी चिजों से गुजंरते है हर घडी हर पल और बहुत बार यही ख्याल मन मे आता है कि यह पल मेरे साथ है शायद कुछ ठोस बच जाएँ हमारे हिस्से पर सत्य बहुत असहनीय सा है। हर वक्त कुछ पाने की जद्दोदाह मे वर्तमान भुलकर भविष्य की चिंता सब कुछ छीने जा रही है। सब कह रहे है वर्तमना मे जीओ, भुत छीने जा रही है। सब कह रहे है वर्तमान मे जीओ, भुत या भविष्य मे व्यर्थ न बनो पर क्या वर्तमान कुछ है ? !!!

     मनुष्य किसी भी भाव या वस्तु का अवलोकन अपने मानस एवं बुद्धि में करता है विचार, इसके अतिरिक्त आपके पास कुछी नही। वर्तमान में होते हुये किसी भीतिक वस्तु को कैसे मानेंगे आप? वह भी केवल एक ऐहसास है। दुनिया कितनी भी अपने असल वक्तव्य पर जोर दे परंतु वे भी अपनी मुठ्ठी मे रेत या पानी को दबोच नही रख सकते उनेहे भी यह मानना ही होगा की वह निकल जाएगा यह पल भी निकल जाएगा। रह जाएगा तो बस ऐहसास।

     रह जाएगी बस हर पल की सुंदरता जिसे आप अपने खयालो के नयनी से देखकर उस आहलाद्दायी ऐहसास का रपान अनुभव कर पाएँगे। वर्तमान मे चल रही हलचल आपके पास केवल आपके ऐहसासो मे जमा हो सकती है उसका दुसरा कोई घर आप नही बना सकते। वर्तमान भी केवल ऐहसासो से ही जिया जा सकता है। वर्तमान भी केवल ऐहसासो से ही जिया जा सकता है। अब आप ही देख लिजिए, सुंदर बाग का फुल देखकर आप उसकी सुंदरता की सराहना तभी कर सकते है जब आप उसके विषय मे सोंचे। उस सुंदर फुल को मियांर तक, उसके गुलजार तक पहुँचाने के ऐहसास मे ही उस वर्तमान की सुंदरता है, जो केवल आपके ऐहसासो से अनुभव की जाती है।  

 हर दिन हर पल एक नया ऐहसास लेकर आता है, भौतिक संकल्पनाओ को मध्यस्थ कर उसे व्यर्थ मत किजिए उस फुल को गुलजार तक पहुंचाने पर विचार किजिए। उस पल को इस तरह गुलदस्ते मे सजा दिजिए की हर बार उस गुलदस्ते को देखककर वर बगिया का फुल पुनः जिवित नजर आएँ उसी बगिया मे, आप इन ऐसासो की प्रबलता को नही जानते, इनमें इतनी ताकत है कि, इनके बल से आप इस वर्तमान को बार बार असी सुंदरता से देय जाएंगे। कुछ ठोस वस्तु पाने की लालसा से इन ऐहसासो को सौंदकर चलना बस मुठ्ठी मे भरी रेत को और अधिक ताकत से बंद करने के बराबर है, जो अवश्य ही फिसल जाएगी और रह जाएगी बस धुल। क्योंकि यह जो एक बात है बस ऐहसास ही ऐहसास है।

     इस संसार मे सबसे ज्यादा आश्चर्य एवं सुंदरता से पुर्ण है वह है यह प्रकृति। इसकी प्रबलता इतनी सुंदर है कि, आप इसके सुंदर ऐहसासो मे अपना संपूर्ण जीवन उसी ताजगी के साथ व्यतित कर सकते है जैसा आप कुछ वर्षों पहले किया करते थे। फिर से उस उगते सुरज की सुंदरता को अनुभव कर सकते है, लहलहाते खेतो मे चमचमाती ओस की बुंदो से गुफ्तगु कर सकते है, उन्ही खेलो को फिर से जिवित कर सकते है जिव्हे खेलकर आप बड़े हुए। उन्ही परिवार की एकत्रित बातो को दोबारा एकत्रित होकर अपना भुतकाल याद कर सकते है।

     कागज की करती डुब गई तो क्या हुआ. बारिश तो अब भी आती है। सावन, वसंत अपनी रंगीन दुनिया लेकर आज भी आते है। बस हमे करना ईतना ही है कि, अपने पुराने अनुभवो को पुन:जीने के लिए उन पुरानी बातो को फिर से जिवित करना होगा। कम ही सही पर कभी तो वसंत के बहार को महसुस करे। चगडंडीयो से गुजरकर अपने जीवन को याद केरा उन बचपन के खेलो के फिर से बच्चा बनकर कुछ वक्त तो खेलो उन लट्टु, गिल्ली डंडा, कंचो को थोडा तो याद करें। केवल पाँच बार कागज को मोडकर बनने वाली उस कश्ती को एकबार फिर जीवन के मँझधार मे छोडे। कितना अप्रतिम ऐहसास होगा यदि हम उन पलो को फिर से दोहराएँ। आज भी कुछ बदला नही, प्रकृति वही है चीजे वही है। बदली है तो बस हमारी मानसिकता।

     हम अपने दिखावे के आवरण के निचे दबकरइस सुंदर ऐहसास को महसुस ही नही कर पा रहे है। न जाने यह जद्दोदाह किस लिए कर रहे है। प्रत्येक व्यक्ति को लगता है।